ऊधो बाराबांट गया ।

ऊधो बाराबांट गया ।
टनों बोझ लादे यह गदहा किस किस घाट गया ।।


करुणा कातर चीपों-चीपों
हास्य प्रसंग बना
कान उमेठे क्रोधित धोबी
ऊपर लट्ठ तना
क्रुर विशेषण गायक वाला आँसू चाट गया ।।

क्षुद्र तलैया नाले नदिया
कैसी लोल तरंग
दूर रही कलुषित अंगों से
परिमल पावन गंग
कशल भगीरथ खास क्षेत्र हित धारा काट गया ।।

कोमल कविता नहीं पुतलियाँ
आँखें शुष्क निबन्ध
कटु यथार्थ पथरीला जीवन
जर्जर जार कबन्ध
बिकना, बंधना तंग तबेले नींद उचाट गया ।।

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ऊधो पूत मवेशी निकला ।।

ऊधो पूत मवेशी निकला ।
श्यामलकाठी वर्णशंकरी पिंगलकेशी निकला ।।


तोड़ गुरुत्वाकर्षण सारे
शून्य कक्ष में उछला
मांटी से संपृक्त नहीं है
रद्द कर चुका पिछला
अर्थहीन है कजरी विरहा
आल्हा गायक पगला
तुलसी सूर कबीरा मीरा
कौन खेत की मूली
आयातित दर्पण ही देखें
घ्ग में सरसों फूली
देख घमड़ते बादल इसके
भीतर यक्ष न जगता
लहराती फसलों में नद सा
रंच न वक्ष उमगता
संस्कृति मूत्र विसर्जन वाली
उठी श्वानवत टांगें
बीच सड़क पर नंगा नाचे
पितर क्षमा हैं मांगे
अंग्रेजी ध्वनियों पर इसका
रोम रोम है मचला
लज्जित कोख, छुपाती मुखड़ा अंक ग्लानि से पिघला ।
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ऊधो सफर बड़ा रेतीला ।।

ऊधो सफर बड़ा रेतीला ।।
घिस घुटनों तक पांव रह गये, मरु की दारुण लीला ।।


हर बढ़ते पग के आगे
आड़े आया टीला
गिरते पड़ते पार किया तो
बदन पड़ गया ढीला
चक्रव्यूब टीलों का दुर्धर
ऊपर रवि चमकीला ।

रात न आती चांद न उगता
केवल दिवस हठीला
रक्तवाहिनी नस में बहता
पावक तरल पनीला
ऊपर आगी नीचे आगी
सब कुछ रत्किम पीला
पड़े पड़े असहाय देखता गड़ा वक्ष में कीला ।।
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ऊधो मैं मूरख मतिमन्द ।।

ऊधो मैं मूरख मतिमन्द ।।
चंद्रगुप्त चाणक्य नहीं जो खोद उखाडूँ नंद ।।


धँसती नींव खिसकती ईंटे
प्रेत छाँह घर मेरा
चमगादड़ उल्लू सांपों का
इसमें सतत बसेरा
चीटी केंचुए खटमल मच्छर चौमुख मल की गंद ।।

बंद घेराव आग हड़तालें
आरक्षी का डंडा
इतने डैनों सेवित पालित
लोकतंत्र का अंडा
हाथ पोलियो मारे मेरे कर न सके कुछ बंद ।।

हिन्दू मानस मुद्रित अंकित
लेंगे प्रभु अवतार
दीनदयालु प्रगट हों जग में
दुःख करेंगे क्षार
तम के बादर पर्वत ऊपर लिखें किरन के छंद ।।
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ऊधो रक्त श्वेत में डूबा।

ऊधो रक्त श्वेत में डूबा।
कोड़ों ने है खाल उधेड़ी यह दुश्मन का सूबा।।


चंदन वन की रुह देह में
चौमुखि सुरभि बिखेरी
यत्न आदमी रह पाने के
बने राख की ढेरी
सोने के आराध्य यहाँ के चाँदी की महबूबा।।

नाजी शिविर यातना चैंबर
पग पग क्रूर कसाई
जड़ से उखड़े धरती छूटी
मुँह बाये है खाई
मुँह बाये है खाई
धरा रह गया सूने दीवट हर रोशन मनसूबा।।

अपमानों का केंसर काटे
छीजे धुनी मनीषा
उगते शूल, त्रिशूल शून्य में
सब कुछ जकड़े मीसा
शबनम रतन धूल पर बिखरे अर्ध्य सूर्य से ऊबा।।
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ऊधो सासों का इकतारा

ऊधो सासों का इकतारा
बजता रहे तार मत टूटे गाता म बनजारा।।


यह घर यह परिवार मोह की
मदिरा के हैं प्याले
मित्र शत्रु-नगरी के वासी
अनगिन मकड़ी जाले
इसमें उलझा प्राण इसे यह सब कुछ कितना प्यारा।।

कूचे गलियाँ सड़के भीड़े
रिश्ता कितना गहरा
लोहू कर्दम लथपथ सांसें
स्वर्गिक नर्क सुनहरा
फिर फिर जनम मिले फिर भोगें फिर चूमें अंगारा।।

बाणों की शय्या पर लेटा
फिर भी मृत्यु न चाहे
इस इच्छा इस आकर्षण को
रोये या कि सराहे
क्रूर कल्पना कितनी तट की बना रहे मंझधारा।।
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ऊधो टूटेगी तटबन्ध।।

ऊधो टूटेगी तटबन्ध।।
इतने बादर इतना पानी अंतर्यामी अंध।।


हाड़ मांस माटी का पिंजर
बिजली बज्र रकीब
पीड़ा के गज अनथक झूमें
अत्याचार नकीब
मुरली फूँक रही है पावक कोयला सातों रंध।।

रोम रोम पर्याय क्षवण के
सबका कथ्य सुना
दर्दमंद करुणार्द्र प्राण ने
रपटिल पंथ चुना
रिसे मवाद स्नायुमंडल में पसरे पाटल गंध।।

एक अकंठित साथी मिलता
नग्र निर्वसन नाते
छाती पर यह शिला न होती
हानि लाभ बंट जाते
यों तो साथ कारवां पूरा लेकिन सभी कबंध।।
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